नयी नयी साइकिल पे देखो
नया नया सवार
लहराता सड़कों पे जैसे
हर दिन हो इतवार
पीछा करता उसका देखो
कुत्ता एक सफ़ेद
रिश्ता ये सड़क का जिसमें
मिट जाते सब भेद
लपक लपक के पंजा मारे
खेले चोर सिपाही
और खिल खिल हँसता इठलाता
साइकिल सवार हमराही
सूरज ढला माँ ने भीतर
दी उसको आवाज़
"घर आ बेटा देर हुई तू
बहुत खेल लिया आज"
अभी नहीं बस देर थोड़ी
और खेलने दे माँ
हो जाऊँगा कल बड़ा तब
सीख लूँगा जीना
घर-बाहर अंतर-मंतर का
आज मुझे ना मान
कल छन्नी से छनने ही हैं
राजा, रंक, श्वान
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