काले अक्षर लगते जैसे
लम्बी सी रस्सी के बल
हवा रही जब खींच मेरी
चोटी बह-बह, कह रही हो "चल!
चलें खेलने बादलों से
तू, मैं, गौरैय्या और मोर"
गीली मिटटी महक रही है
मानो लड्डू चारों ओर!
किताबें रूठ रही हैं लेकिन
अंग्रेजी में आँख दिखा
पर फुदक-फुदक ये आवारा मन
बंद नियम में होता कहाँ ?
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