Wednesday, June 8, 2011

किसका बोझ ?


काका, छोड़ो ये लारी
मुझे भी चलाने दो इसे
मैं डिज़ाइनर हूँ
खींच के तुम्हारी मजदूरी
और ढो के तुम्हारा भार
मैं भी समझ सकूँ
तुम्हारा दर्द.
बनाऊँ फिर एक ऐसी लारी
जो कर दे काम आसान तुम्हारा

काका चलते चले जा रहे थे
क्विंटलों बोरियाँ कहाँ ख़त्म
कहाँ बाजू शुरु
ढीली चमड़ी को नकारती
नसें अभी भी तनी हुई थीं
नीली, लारी का ईंधन

धुआँ निकल रहा था
नाक से, हूँफ़-हूँफ़ कर
उसी हूँफकार में दबे
निकले कुछ स्वर
जैसे मोटर की गड़गड़ाहट
बोले, "टाइम नहीं है"

लारी आगे बढ़ी जा रही थी
भेदती बाज़ार का कोलाहल
धूमिल होते दोनों जैसे
अतीत की किसी पेंटिंग के किरदार
और मैं मूक दर्शक
एक पल चित्र के अन्दर
दूजे बाहर

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