Sunday, June 26, 2011

खोज

सूरज की खोज में
चढ़ी इस पहाड़
कुछ पल सेकी धूप
छलके आँसू
जैसे गर्मी में बरसात

अब चढ़ रही हूँ
दूसरी पहाड़ी
ढूँढती सूरज,
मिलती सिर्फ़ धूप

Friday, June 17, 2011

अद्वैत

काली मक्खियाँ भिनभिना रही हैं
गा रहीं हैं शगुन वाला गाना
मृत बना अमृत
हित - रहित सहित
वादी विवादी स्वरों का
है एक तराना

Wednesday, June 15, 2011

उलझन

ऊन का गोला उलझा पड़ा
जाने कहाँ छिपा है छोर
जो बीच से काटूँ
पड़ेगा कम
जो खोलूँ धीमे
जाएँगी बीत
सर्दियाँ

Tuesday, June 14, 2011

अनपढ़

मत सिखाओ मुझे
गणित के गुण
साहित्य का सत
भूगोल के नाम पे
मत दिखाओ नक़्शे

रह जाने दो अनपढ़
नहीं चाहती समझना
कलम पकड़ने के तरीक़े
बहने दो मुझे
नदी की तरह
रिसती पत्थरों के बीच
अंधी छलांग लगाती
मूर्ख, निर्भीक

Saturday, June 11, 2011

सुनो लोहार!

लोहा तैयार है
जलाओ भट्टी
मारो हथोड़ा
लोहा तैयार है

टूटेगा नहीं
मुड़ेगा थोडा
अभिमान रहित
आस्था पूर्ण
लोहा तैयार है

Thursday, June 9, 2011

दोस्त

नयी नयी साइकिल पे देखो
नया नया सवार
लहराता सड़कों पे जैसे
हर दिन हो इतवार

पीछा करता उसका देखो
कुत्ता एक सफ़ेद
रिश्ता ये सड़क का जिसमें
मिट जाते सब भेद

लपक लपक के पंजा मारे
खेले चोर सिपाही
और खिल खिल हँसता इठलाता
साइकिल सवार हमराही

सूरज ढला माँ ने भीतर
दी उसको आवाज़
"घर आ बेटा देर हुई तू
बहुत खेल लिया आज"

अभी नहीं बस देर थोड़ी
और खेलने दे माँ
हो जाऊँगा कल बड़ा तब
सीख लूँगा जीना

घर-बाहर अंतर-मंतर का
आज मुझे ना मान
कल छन्नी से छनने ही हैं
राजा, रंक, श्वान

Wednesday, June 8, 2011

आवारा

काले अक्षर लगते जैसे
लम्बी सी रस्सी के बल
हवा रही जब खींच मेरी
चोटी बह-बह, कह रही हो "चल!

चलें खेलने बादलों से
तू, मैं, गौरैय्या और मोर"
गीली मिटटी महक रही है
मानो लड्डू चारों ओर!

किताबें रूठ रही हैं लेकिन
अंग्रेजी में आँख दिखा
पर फुदक-फुदक ये आवारा मन
बंद नियम में होता कहाँ ?