सफ़रनामा
Wednesday, June 29, 2011
बुकमार्क
तुम तो कह कर चले गए
कथन तुम्हारा रह गया
किताब में भूले हुए
गुलाब की तरह.
अब जितनी बार किताब खोलूँ
खुले एक ही पन्ना
उड़े
एक ही
ख़ुशबू
Tuesday, June 28, 2011
शीर्षक
लिखती हूँ लेकिन
मैं कवि नहीं
गाती हूँ अकसर
पर गायक नहीं
खाली टंगा है बोर्ड
ऑफिस के बाहर
बिल्लों का बोझ
उठा पाती नहीं
Sunday, June 26, 2011
खोज
सूरज की खोज में
चढ़ी इस पहाड़
कुछ पल सेकी धूप
छलके आँसू
जैसे गर्मी में बरसात
अब चढ़ रही हूँ
दूसरी पहाड़ी
ढूँढती सूरज,
मिलती सिर्फ़ धूप
Friday, June 17, 2011
अद्वैत
काली मक्खियाँ भिनभिना रही हैं
गा रहीं हैं शगुन वाला गाना
मृत बना अमृत
हित - रहित सहित
वादी विवादी स्वरों का
है एक तराना
Wednesday, June 15, 2011
उलझन
ऊन का गोला उलझा पड़ा
जाने कहाँ छिपा है छोर
जो बीच से काटूँ
पड़ेगा कम
जो खोलूँ धीमे
जाएँगी बीत
सर्दियाँ
Tuesday, June 14, 2011
अनपढ़
मत सिखाओ मुझे
गणित के गुण
साहित्य का सत
भूगोल के नाम पे
मत दिखाओ नक़्शे
रह जाने दो अनपढ़
नहीं चाहती समझना
कलम पकड़ने के तरीक़े
बहने दो मुझे
नदी की तरह
रिसती पत्थरों के बीच
अंधी छलांग लगाती
मूर्ख, निर्भीक
Saturday, June 11, 2011
सुनो लोहार!
लोहा तैयार है
जलाओ भट्टी
मारो हथोड़ा
लोहा तैयार है
टूटेगा नहीं
मुड़ेगा थोडा
अभिमान रहित
आस्था पूर्ण
लोहा तैयार है
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